स्वीकार के अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं है…

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डायरी/ कुमार अजय

कोई हमें कहना चाहता है, हम नहीं सुन पाते और वह खामोश हो जाता है। यहां उल्टा हुआ। वे मुझे सुनना चाह रहे थे और अब मैं निःशब्द हूं। इसी तीन तारीख को उनका फोन आया था। कह रहे थे, ‘पांच को स्कूल में छोटा-सा कार्यक्रम कर रहे हैं। सभी साथियों की इच्छा है कि आप आएं। आपको सुनने का मन है।’मैंने अपनी विवशता जाहिर कर दी और कहा, ‘भविष्य में कभी भी आ जाऊंगा। एक बार तो आप किसी और को बुला लें।’परसों-तरसों डायरी पर उनकी प्रतिक्रिया थी। आज सवेरे-सवेरे एक शुभचिंतक का मैसेज मिला कि राजेंद्र मीणा नहीं रहे। सूचना के विश्वसनीय स्रोत के बावजूद देवेंद्र राहड़ को मैसेज किया, उन्होंने कन्फर्म किया। शाम की एक्सरसाइज के बीच, उनके छत से गिर कर दम तोड़ देने की खबर ने दिल तोड़ दिया। यकीन करना तो संभव नहीं था लेकिन और कोई विकल्प भी नहीं। ऐसे कितने ही लोग हमारे बीच से निकल कर जाते रहे हैं, जा रहे हैं और हमारे पास स्वीकार के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। राजेंद्र जी हमारे बीच नहीं रहे।

विद्यालय का वह पहला ही दिन था, जब राजेंद्र जी से मुलाकात हुई। दुखद संयोग है कि उस दिन बतौर अतिथि हमारे साथ रहे लेफ्टिनेंट (सेवानिवृत्त) युनुस खान भी ऐसी दुर्घटना के शिकार हुए और आज हमारे बीच नहीं हैं। युनुस जी भी बड़े सहज-सरल लेकिन ऊर्जावान, उत्साही और सकारात्मक व्यक्तित्व के धनी थे। उनसे मिलकर बड़ी ऊर्जा मिलती थी। सभी ग्रामीण क्षेत्रों की तरह ही, गांव में महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम राजकीय विद्यालय खुलने के साथ ही इस शंका ने भी जन्म लिया कि पुराने-जर्जर भवन में, सीमित संसाधनों के बीच ये हिंदी माध्यम के अध्यापक आखिर कैसे इंग्लिश मीडियम स्कूल चला पाएंगे। स्कूल में उस दिन, बतौर प्राचार्य आए राजेंद्र जी को पहली बार देखा तब भी लगा कि कैसे यह शांत, सरल व्यक्ति इस चुनौती को झेल पाएगा। थोड़ा हो-हुल्लड़बाज आदमी हो, तो कहीं न कहीं से मदद जुगाड़ लेता है लेकिन राजेंद्र जी के व्यक्तित्व में यह हंगामेबाजी कभी दिखी नहीं। पर अच्छी बात थी कि व्यक्तित्व की यह सरलता और शांतचित्तता, उनकी निष्क्रियता नहीं थी।

राजेन्द्र जी जब भी मिले, विद्यालय के लिए कुछ रचनात्मक चर्चा ही हुई। वैसी ही सहजता के साथ। धीरे-धीरे कुछ संसाधन भी जुटे। ग्राम पंचायत की ओर से भी कुछ काम हुआ। बड़ी बात यह कि राजेंद्र जी कभी संसाधनों का रोना लेकर नहीं बैठे। विद्यालय का असल संसाधन क्या है और असल काम क्या है, यह उन्हें ठीक से पता था। हम सब लोग जिस व्यवस्था में हैं, वहां संसाधनों का रोना कभी खत्म नहीं होता। शिक्षक साथियों में भी यह समस्या आम है। शासन-प्रशासन से जुड़ी दूसरी गतिविधियों का काम भी अध्यापकों को करना पड़ता है, उसकी हमेशा एक शिकायत स्कूलों को रहती हैं। इतनी सारी सूचनाएं देनी पड़ती हैं, इतनी सारी डाक बनानी पड़ती है। सरकार खुद पढ़ाने देना नहीं चाहती, यह इल्जाम हमेशा रहता है। ऐसे शिकवे कभी राजेंद्र जी की जुबान से नहीं सुने। बच्चों की पढ़ाई, उनकी प्रोग्रेस को लेकर हमेशा एक उत्साह देखने को मिला।स्कूल को संसाधनों की जरूरत रही, अब भी है। शिक्षण संस्थानों के लिए जन सहयोग की एक बेहतर परम्परा क्षेत्र में है लेकिन आमतौर पर वणिक वर्ग के धनाढ्य ही इन सूचियों में सर्वोच्च नजर आते हैं। गांव में ऐसे परिवार नहीं होने से भामाशाहों की ओर तकते गांव के संस्थानों को तनिक दिक्कत ही रहती है। राजेंद्र जी इस वस्तुस्थिति को भी समझा और कभी किसी से ऐसे संसाधन की मांग नहीं की, जो सामने वाले के लिए मुमकिन नहीं हो और वह धर्मसंकट में आ जाए। थोड़ा-थोड़ा करके सहज ढंग से चीजें जुटाईं। जिससे जितना मिला, उसी में एक संतोष रखा और देने वाले के प्रति सदैव एक कृतज्ञता भी हमेशा उनके व्यवहार में दिखी।जिसे बड़ी इमारतें और कृत्रिम चकाचैंध चाहिए, वह भले ही इस विद्यालय से मिलकर खुश नहीं हो लेकिन जो बच्चे यहां पढ़ते हैं, उनके अभिभावक संतुष्ट नजर आए हमेशा। स्टाफ में भी काम का वातावरण मिला। किसी भी संस्था प्रधान के लिए, खासतौर से स्कूलों में, यह एक बड़ी चुनौती रहती है, जिसमें राजेंद्र जी हमेशा सफल नजर आए। बहरहाल, राजेंद्र जी अब हमारे बीच नहीं हैं। महज छयालीस वर्ष की आयु में ऐसे रचनात्मक, मृदुल, सक्रिय और सकारात्मक व्यक्तित्व का जाना निस्संदेह एक निराशा जगाता है लेकिन राजेंद्र जी की वह मोहक मुस्कान, सरल-मृदुल व्यवहार और रचनात्मकता हमेशा हमारे बीच बनी रहेगी। जब भी उस स्कूल के सामने से निकलूंगा, राजेंद्र जी मुस्कराते हुए निकलकर आएंगे और…। (14 सितंबर, 2024)

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